Tantra Mantra Yoga Guru

नासनं सिद्धसदृशं न कुम्भसदृशं बलम्। न खेचरीसमा मुद्रा न नादसदृशो लयः।। सिद्धासन के समान कोई आसन नहीं , कुम्भक के समान कोई बल नहीं , खेचरी के समान कोई मुद्रा नहीं और नाद के समान कोई लय नहीं ।

Friday, March 30, 2007

यो गुरुः स शिवः प्रोक्तो

यो गुरुः स शिवः प्रोक्तो यः शिवः स गुरुः स्मृतः।
उभयोरन्तरं नास्ति गुरोरपि शिवस्य च।।
यतो न वेदा मनसा सहैनमनप्रविशन्ति ततोऽथमौनम्।
यत्रोत्थितो वेदशब्दस्तथायं स तन्मयत्वेन विभाति ।।

योगसन, स्वच्छता, स्नानादि से शरीर पुष्ट एवं शुद्ध होता है। यद्यपि उनका ध्यान-क्रिया से कोई सीधा संबंध नहीं है, तथापि उनका एक महत्व है। यम, नियम का पालन करने पर आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार को अभ्यास करने पर धारणा की अवस्था प्राप्त होती है। धारणा ध्यान की पूर्वावस्था है और ध्यान का परिपाक समाधि है। (समाधि की विभिन्न प्रक्रियाएं, आत्मा का प्रक्षेपण इत्यादि, सिद्ध गुरु के निर्देशन में ही करना चाहिए ।

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